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Posted on August 2, 2013 at 5:55 AM

शयन में देव धार्मिक एवं मांगलिक कार्य क्यों नहीं ?

ब्रह्मा जी ने प्रकृति की स्थापना एवं आवश्यक जीवन के लिए छ्ह ऋतुओ की स्थापना की जिन्हें ग्रीष्म, वर्षा, शीत,हेमंत,शिशिर,बसंत आदि नामों से पुकारा गया| इसी आधार को लेकर छ्ह माह देव शयन और छह माह देव जागरन को रखा गया,जिसे ज्योतिष विज्ञान उत्तरायण एवं दक्षिणायन कहता है |उत्तरायन में देवताओं का जागरण होता हे|इस समय जो भी कार्य किया जाते हे वह् देवताओं को प्राप्त होते है और कार्य पूर्ण शुभ भी रहते है|दक्षिणायन में राक्षसों का अधिकार होता हे| इस समय जो भी कार्य किया जाते है, उनमे कोई ना कोई बँधा अवश्य आती है और कार्य भी परिपूर्ण नहीं होते, इस समय दी गई आहूति भी राक्षसों को प्राप्त होती हे|

शास्त्रों के आधार पर हमारे मुख्य तीन देवता हे- ब्रह्मा,विष्णु एवं महेश | एक उत्पत्ति करते है, दूसरे पालन और तीसरे उसका अंत और इन तीनों के भी शयन का समय भारतीय शास्त्रों में निर्धारित है| प्रत्येक शयन के लिए चार- चार माह दिए गए हे |सबसे पहले ब्रह्मा जी का शयन होता हे जो पौष मास में प्रारंभ होता है इस समय विष्णु और शिव जागकर पृथ्वी का पालन और रक्षा का दायित्व निभाते है| इसके बाद आषाढ शुक्ल एकादशी अर्थात देव शयन एकादशी से देव उठान एकादशी तक विष्णु का शयन होता है, इसलिए सारे धार्मिक और मागलिक कार्य अस्त रहते है,क्योंकि भगवान विष्णु पृथ्वी के पालनहार और भोक्ता हे| इसलिए उनके शयन के समय कोई रचना नहीं की जां सकती | इस समय शिव जागरण होता है और शिव जागते रहते है|इसलिए मंदिरो में इस समय शिव पूजा का अधिक विधान रहता है| श्रावन मास में शंकर को मानकर अधिक पूजा जाता है|इसके बाद शिव शयन होता है जो भाद्रपद मास की अमावस्या से शिवरात्रि तक चलता है, जिसमे मदिरौ में शिव जी के ऊपर टपकने वाला बर्तन (जलहरी) हटा दिया जाता है| शिवरात्रि के दिन पुन: शिवलिंग के ऊपर जाल वाला बर्तन लगा दिया जाता है| इस प्रकार यह क्रम चलता रहता हे| इसका अर्थ यह हे कि विष्णु शयन के कार्यकाल में धार्मिक और मांगलिक कार्य नही होनी चाहिए क्यूँकि न विष्णु पृथ्वी पर होते है ना ही उत्तरायण एवं ना ही उत्तरगोल| जब सब चीजीं का लोप हो जाता हे तो फिर हमारे भविष्य निर्माण के महत्वपूर्ण पलों को क्यों हम देवशयन में करे|

आचार्य अजय मोहन लाल

Categories: General

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Reply snateebra
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