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This blog contains the essence of a vastcross section of the writing of rishis, sants, the past and the present greats and big wigs of astrology. It will have separate fronts i.e. Finance, Health, Marriage, Children,Profession-Career, Miscellanary, Vastu Shastra, Naturalpathy, information on major festivals of India and other important information for the convenience of the users.

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GARBHPAAT MAHAPAAP HEN

Posted on May 4, 2013 at 6:05 PM Comments comments (407)

गर्भ्रपात महापाप हैं|

संसार के सभी धर्मो में गर्भपात को महापाप बताया गया हैं क्योकि इसमे जीव निर्दोष होता हैं| अपने हाथ से लगाये पेड़-पौधे को काटने से भी मन में दुःख पैदा होता हैं, फिर अपने प्रेम के प्रतीक् गर्भ को नष्ट करना कहाँ की इंसानियत हैं|पशु भी ऐसा काम नहीं कर सकते|श्रीमद्‌भगवत में लिखा हैं कि गर्भ में आए जीव को अनेक जन्मों का ज्ञान होता हैं अंता उसे 'ऋषि' नाम दिया गया हैं | अत: गर्भपात करने से एक ऋषि कि हत्या होती हैं, इससे बढकर और पाप क्या होगा? जनसंख्या - नियंत्रण के बहाने सरकार ने इसे कानूनी और सरल बनाकर सबसे भयंकर भूल की हैं|जो लोग गर्भ- परीक्षण करवा कर कन्याओं की हत्या करते हैं वे तो साक्षात पिशाच हैं| बहुत बार या तो मशीन ग़लत सूचना देती हैं या डॉक्टर पैसों के लालच में लड़के को भी लड़की बता देते हैं और गर्भपात को बढ़ावा देते हैं | बाद में जब लड़का दिखाई देता हैं तो माँ सिर पीट लेती हैं|कन्या के बहाने पुत्रों का गर्भपात कराये जाने की बहुत सी आपबीती घढ्नाएँ औरतों ने मुझे सुनाई हैं जब वे कुंडली दिखाने मेरे पास आती हैं |गर्भपात जघन्य अपराध और महापाप ही नही, इसके साथ ही यदि कोई लड़की अपना पहला गर्भपात करवा लेती तो भविष्य में उसके गर्भ ठहरने की सम्भावना कम हो जाती हैं|बाद में उसे स्वत: ही गर्भपात होने लगता हैं|उसकी मासपेशियाँ कमजोर हो जाती हैं|

एक बार गर्भपात करने वाले डॉक्टर ने गर्भपात की ultrasound फिल्म बनाई|बाद में उसने जब अपनी फिल्म देखी तो अपने कार्य से वह् इतना दु:खी और परेशान हुआ कि अपनी क्लिनिक छोडकर भाग गया|बाद में उस फिल्म को एक सेमिनार में यह फिल्म डॉक्टर को दिखाई गई और गर्भपात के प्रति लोगों का रुझान कम करने के लिए मशविरा हुआ | फिल्म में एक डॉक्टर ने क्या देखा? "गर्भ की वह् मासूम बच्ची अभी बहुत छोटी थी व काफी चुस्त थी | हम उसे अपनी माँ की कोख में खेलते, करवट बदलते व अँगूठा चूसते हुए देख रहे थे| उसके दिल धड्कनो को भी हम देख पा रहें थे और वह् उस समय 120 की साधारण गति से धड्क रहा था| सब कुछ बिल्कुल सामान्य था किन्तु जेसे ही पहले औज़ार (सक्शन pump) ने गर्भाशय कि दीवार को छुआ, वह् मासूम बच्ची डर से एकदम घूमकर सिकुड़ गई और उसके दिल की धड़कन काफी बढ गई | हाँलाकि अभी तक किसी औज़ार ने बच्ची को छुआ तक भी नहीं था लेकिन उसे अनुभव हो गया था कि कोई चीज उसके आरामगाह , उसके सुरक्षित क्षेत्र पर हमला करने का प्रयत्न कर रही हैं|

" हम दहशत भरे यह देख् रह थे कि किस तरह वह् औज़ार उस नन्ही मुन्नी गुड़िया सी बच्ची के टुकडे-दुकडे कर रहा था|पहले कमर, फिर पैर आदि के टुकड़े ऎसे काटे रहे थे जेसे वह् जीवित प्राणी ना होकर कोई गाजर मूली हो और वह् बच्ची दर्द से छ्टपटाती हुई, सिकुड़ कर घूम- घूम कर तड़पती हुई इस हत्यारे औज़ार से बचाने का प्रयत्न कर र्ही थी|वह् इस बुरी तरह डर गई थी कि एक समय उसके दिल की धड्कर 200 तक पहुँच गई | मैंने स्व्यं अपनी आँखों से उसको अपना सिर पीछे झटकते व मुँह खोलकर चीखने का प्रयत्न करते हुए देखा| इसी को डॉक्टर ने "गूंगीचीख" कहा हे जो कि बहुत सटीक हे| अंत में हमने वह् नृशंस दृश्य भी देखा जब संड्सी उसकी खोपड़ी को तोड्ने के लिए तलास रही थी और फिर दबाकर उस कठोर खोपडी को तोड रही थी क्योकि सिर का भाग बग़ैर तोड़े सक्सन ट्यूब के माध्यम से बाहर नहीं जा सकता था | हत्या के इस वीभत्स खेल को संपन्न करने में क़रीब 15 मिनट का समय लगा| हम सभी का मुँह ग्लानि और अपराध बोध से झुक गया"

आर्चाय अजय मोहन लाल

Kuyon hoti he Lakshmi ke saath Ganesh ki pooja?

Posted on April 2, 2013 at 2:40 PM Comments comments (400)

 होती क्यों है लक्ष्मी के साथ गणेश की पूजा ?

दीपावली पर, दुकान प्रारम्भ करते समय लक्ष्मी के साथ-साथ गणेश पूजन किया जाता हैं| बहुत से लोग जनना चाहते हैं कि लक्ष्मी के साथ तो नियमानुसार विष्णु का पूजन होना चाहिए| दरअसल लक्ष्मी के साथ गणेश पूजन का भाव यही हैं कि व्यक्ति लक्ष्मी या धन प्राप्त कर अपना विवेक ना खो बैठे| उसमें दुर्बुद्धि का प्रवेश ना हो जाए|

एक दंत-कथा के अनुसार एक बार एक राजा ने किसी लकडहारे को चंदन का एक विशाल जंगल पुरुस्कार में दिया | लकडहारे में चंदन के गुण और महत्व को समझने की बुद्धि नही थी | फलस्वरुप उसने चंदन के पेड़ काट-काट कर जला डाले एवं पुनः गरीब हो गया| अंत: बिना बुद्धि के लक्ष्मी को स्थिर नही रखा जा सकता| तभी से लक्ष्मी के साथ बुद्धि के दाता गणेश की भी पूजा होने लगी|

एक अन्य दंत कथा के अनुसार एक साधु को वृद्धवस्था में राजसुख भोगाने की इच्छा हुई| उसने लक्ष्मी कठोर तपस्या की| लक्ष्मी ने उसे वरदान दिया कि कल प्रात:कल से तुम्हारा राजयोग चालू हैं|साधु सुबह राजा के दरबार में पहुँचा|लक्ष्मी के वरदान की सत्यता पहचानने के लिए उसने राजा के थप्पड़ मार कर उसका मुकुट नीचे गिरा दिया|राजा और दरबारी क्रोध से काँपने लगे तभी एक काला विषथर उस मुकुट से निकाल कर तेजी से भाग गया|सभी प्रसन्न हुये|साधु को मंत्री बनाया गया| साधु राजसी सुख भोगने लगा| कुछ दिन बाद साधु ने हुक्म दिया कि राजा समेत सब दरबारी राजमहल सें निकल जाओ|ज्यों ही वे निकले भूकंप से राजमहल गिर गया|धीरे - धीरे साधु का पूरा प्रभाव हो गया| वही एक प्रकार से राजा बन गया|उसे अपने धन वा ज्ञान का घमण्ड हो गया |उसने राजमहल में स्थापित भगवान गणेश जी की मूर्तिको हटवा दिया और कहा 'इससे राजमहल की सुन्दरता में कमी आती है| और उसी दिन से उसकी बुद्धि खराब हो गई|उसकी भविष्वाणियाँ ग़लत निकलने लगी| राजा और दरबारियों ने उसे जेल में डाल दिया| जेल में स्वप्न में उसे लक्ष्मी जी ने कहा कि तुमने गणेशजी कि उपेक्षा की हैं, उसी का दुष्परिणाम हैं|उसने जेल में गणेशजी की स्तुति की, अगले दिन वह पुन: मंत्री बन गया| तभी से लक्ष्मी एवं गणेश का पूजन एक साथ प्रारंभ हो गया| गणेशजी के दाहिने भाग में लक्ष्मीजी रहनी चाहिये|आपके सामने बाँई ओर से पहले लक्ष्मीजी विराजमान होगी फिर गणेशजी|

आचार्य अजय मोहन लाल

MAHASHIVRATRI

Posted on March 10, 2013 at 2:55 PM Comments comments (2137)

महशिवरात्रि:- फाल्गुन मास की कृष्ण चतुर्दशी को महाशिवरात्रि कहा जाता हैं| सनातम धर्म में तीन रात्रियों का अधिक महत्व हे| इसमें महाशिवरात्रि के अतिरिक्त कृष्णजन्माष्ढ्मी और कतिक अमावस्या की रात प्रमुख हैं| ये तीन रत्रियां क्रमश: महारात्रि मोहरात्रि एवं कालरात्रि के नाम से जानी जाती हैं|वैसे तो चतुर्दर्शी तिथि के स्वामी भगवान शिव ही हैं,परन्तु इनमें फागुन मास की कृष्ण चतुर्दशी ही प्रिया हैं| इस रात्रि को सर्वप्रथम सृष्टि में शिवलिंगं प्रकट हुआ था| शिवलिंग न केवल साक्षात शिव हैं, वरन्‌ इसमे संपूर्ण युनिवेर्स समाया हुआ हैं| शिवलिंग के मूल में ब्रह्माजी, मध्य में भगवान विष्णु और ऊधर्व्र में महादेव स्थित होते हैं|वेदी महादेवी हैं और लिंग महादेव हैं|

भगवान शिव त्रिदेवों में प्रमुख देव हैं| इन्हें सृष्टि का संहार पुरुष माना गया हैं| ब्रह्माजी सृष्टि को उत्पन्न करने वाले और विष्णु जी उनका पालन करने वाले हैं| महाशिवरात्रि के दिन रात्रि के चारों प्रहार में भगवान शिव के पूजन अर्चन और अभिषेक का विशेष फल बताया गया हैं| प्रथम प्रहार में दुग्ध, दुतीया प्रहार में दधि, तृतीया में घृत द्वारा और चतुर्थ प्रहर में मधु द्वारा स्नान करवा कर उनका पूजन करने से विशेष लाभ मिलता हैं|

भगवान शिव की पूजा में रुद्राक्ष, भस्म और त्रिपुण्ड धारण का विशेष महत्व हैं| शिवलिंग पर बिल्व पत्र अर्पित करने का विशेष महत्व हैं. शिवलिंग पर आक के फुल, कनेर के फुल, द्रोण पुष्प, अपामार्ग (चिचिड़ा),कुश के फुल, शमी के पते, नीलकमल,धतूरा एवं शमी के फूल उक्तरोक्तर शुभ माने गए हे| भगवान शिव को ऐसे पुष्प और पत्र पसंद हैं जो अन्य देवताओं पैर नही चढाए जाते | वैसे भगवान शिव चाहें श्मशान में निवास करते हों, लेकिन शिवालय में उनके साथ उनका संपूर्ण परिवार और नन्दी भी विराजमान रहते हैं| महशिवरात्रि के दिन भगवान शिव के मन्दिर में जाकर शिवलिंग सहित उनके संपूर्ण परिवार का पूजन करने से उनकी विशेष कृपा प्राप्त होती हैं और इस संपूर्ण अहोरात्र भगवान शिव के निमित उपवास रखते हुए मन, वचन और कर्म से उनके लिए किया गया पूजन कर्म निशिचत रुप से साधक का कल्याण करने वाला होता हैं|

आचर्य अजय मोहन लाल

Peepal Tree

Posted on February 18, 2013 at 9:50 PM Comments comments (49)

पूज्य वृक्ष - पीपल

हिंदू धर्म ग्रंथों में पीपल पूजन और प्रदक्षिणा का विशेष मह्त्व बार-बार बताया गया है|तंत्र,मंत्र,कर्म-कांड,श्राद और संस्कार मॆं पीपल का वृक्ष बहुत ही उपयोगी है|पीपल कि वृक्ष कि सात परिक्रमा करने का विधान है,क्योंकि इसमें सभी देवताओं का निवास होता है|भगवान बुध ने चंचल मन कि एकाग्रता के लिए पीपल वृक्ष के नीचे ध्यान लगाया था| जिस व्यक्ति के जीवन में बहुत अधिक सघर्श हो,जन्म कुण्डली में अनेक ग्रहों कि निर्बलत के कारण भविष्य में उन्नति कि संभावना प्रतीत न हो तो ऎसे व्यक्ति भी यदि प्रतिदिन प्रात:कल स्नान आदि नित्य क्रम से निवृत हो कर यदि पीपल के वृक्ष पर स्वछ जल चढाये तो उस व्यक्ति को चमत्कारी रुप से शुभ फल मिलना प्रारभ हो जाते है|ऐसा करने से पीपल वृक्ष पर रहने वाली आत्मायै उसकी सहायक बनकर उसके जीवन में चमत्कारी परिवर्तन कर देती है|यह प्रयोग शनिवार के दिन से शुरु करना चहियें|जिस व्यक्ति के लिए शनि पीड़ादायक हो उसे शनिवार के संध्या के समय पीपल के वृक्ष के नजदीक तेल का दीपक जलाना चहियें| इससे शनि कि पीडाएँ शांत होती है| पीपल वृक्ष कि वंदना का समय प्रात:6 बजे से 12 बजे तक ही है| बहुत से लोगो कि धारणा है कि इसके उपर प्रेत आत्माएँ रहती है, यह सत्यं नही है| जहाँ देवताओँ का निवास होता हो वहा ये बुरी आत्मये कैसे ठहर सकती है? कई प्रदेशों में मुर्दे के जलने के बाद तीसरे दिन अस्थियों का संचय करके उन्हें एक हंडिया में भर कर पीपल कि शाखा से लटका देते है और फिर उन्हें अपनी सुविधा अनुसार गंगाजी में प्रवाहित कर देते हैं |पीपल कि शाखा से लटकाने का उद्देश यह है कि उन अस्थियों में किसी बाहरी आत्मा का प्रवेश न हो जाएँ| सोमवती अमावस्या को पूजा करके पीपल वृक्ष कि 108 परिक्रमा करने स्त्रियों के सौभाग्य कि रक्षा होती है| मंत्र जाप के लिए कोई नई माला खरीदी जाए तो उसे पीपल के पते के दोने में रखकर पहले अभिमंत्रित करना चाहिए| यदि किसी व्यक्ति ने ऎसे गुरु से दीक्षा ले ली जो व्यभिचारी हो तो उसे पीपल के पते पर लाल चंदन से गुरु मंत्र लिखकर गंगा में बहा देना चाहिये एवं फिर दूसरे योग्य गुरु से दीक्षा लेनी चाहिये|

VASTU-SHASTRA AND MARITAL HARMONY

Posted on February 14, 2013 at 8:35 AM Comments comments (19)

VASTU SHASTRA AND MARITAL HARMONY

The bed room and bed are very important areas of the home and if it is not according to the vastu principles, then it can create disharmony and can break relationship. The other thing which should be given due importance is location of your bed room in the house.

One should not have the bed room in the south-east direction of the house.The south-east is the fire zone (Agni Koon) and sleeping here causes friction and clashes in the relationship. The problems between the couple multiply and disputes get intensified. The best position of the bed room is in the south-west, south, west or between north and north west. If the room from south east zone cannot be changed, then neutralize the negative effect by placing green plants or use green colour on walls or furnishings.

The other thing which is also important is the quality of the bed. The queen size bed serves to be ideal size and two people can sleep comfortably and keeps the couple close. The king size bed may be too big and can create distance between the couple. Any bed which is too small can create tension in the relationship by being too claustrophobic. Box beds are ideally not recommended due to splitted effect but due to paucity of space, they become unavoidable. For couple facing marital disharmony, it is recommended to use a double bed with a single mattress. You can stitch up the seams to make the mattress appear as a single unit. Another remedy is to get a foam fitted red sheet of the size of the bed and cover the whole bed with the sheet. You can place red durrie under the mattress. This is also good remedy if you feel that your relationship is lacking in passion. This also raises your enery level and is helpful if you feel plagued by depression, weakness or lethargy

The area under the bed must be kept clean as dirt and dust give a lot of negativity. Shoes, slipper etc must not be kept under the bed. Sort out things kept in the box-bed from time to time. Another cause of the problem between the couple is when the stove in the kitchen faces the sink. You can solve this issue by hanging a round facet crystal ball between the stove and the water source.

Donot sleep under the beam. Beams running lengthwise down the bed are believed to create marital disharmony and drive the couple apart. Remedy this by hanging two crossed bamboos flutes from the beam with their faces down. Objects, paintings and pictures which are associated with happy memories for the couple should be displayed in the south-west direction of the room. A pair of doves or swams is regarded as a symbol of love, romance and fidelity.

The south-west is zone for power and it also governs love, luck, romance and family happiness. You can hang a wind chim with a crystal in the south-west corner of your bedroom. Donot keep television in a room and cover the television screen with cloth in the night. Make sure that pointed objects like nails, iron spikes or sharp edge furniture are not pointed towards the bed. Remove all the clutter, unnecessary objects and old cloths from the houses. Refuse like garbage, dustpins, brooms etc must be moved out of sight. Objects like hanging electricity cables or broken glass out side the main door create disharmony in all relationships. Last but not the least, donot keep an open 'mandir' in the bedroom.

If unfortunately you have had a broken marriage or a broken relationship, get rid of the marriage bed and used linen and start any new relationship a fresh. It is better that you wipe out all negative associations and memories for the new relationship to blossom.

Acharya Ajay Mohan lal

VASTU-SHASTRA AND CHILD BIRTH

Posted on February 8, 2013 at 12:15 AM Comments comments (10)

VASTU – SHASTRA AND CHILD BIRTH

The presence of children are essential in home. Children fill a house with live, happiness and laughter. In case one is willing to start family and is facing any problem, then it would be desirable to have close look at one's surroundings.

Any defects in North-East of house or the plot on which house is constructed affect the children. A cut in the North-East, heavy construction on North-East or toilet in North-East direction may give bad results. North-East direction should be kept clean, clutterfree and lower than the South-West for healthy children.

1. A North-West bed room is the ideal direction for bed room for newly married couple, desiring of family.

2. The placement of mirrors in the bed room should be such that they donot reflect the bed or cover the mirror with cloth.

3. Use colours such as lilac, peach, mint or white to brighten the bed room.

4. Keep fresh flower or fruits especially pomergranates which is symbol of fertility in a room.

5. The attached toilets doors must be kept shut and toilet seats cover down.

6. The wife should sleep on the left side of the husband.

7. The foot of the bed should not directly face the door of the room.

8. The bed should not be under the beam and sharp object like the edge of the table or cabinet or the wall corner are not pointed towards the bed.

9. The head of the couple should be towards the South or East direction. Sleeping with the head towards north is totally prohibited.

10. After conception, the couple should move towards southern direction. It is important for safe continuation of the pregnancy.

 

Acharya Ajay Mohan Lal

Golden Rules of Vastu-Shastra for purchase of land

Posted on January 31, 2013 at 11:35 AM Comments comments (181)

GOLDEN RULES OF VASTU SHASTRA

FOR SELECTION OF LAND

1. Land which is fertile, has good quality soil & sweet smell is considered auspicious for construction.

2. Square and rectangular plots are best. For rectangular plots,length of plot should not be more than twice its breadth.

3. Avoid irregular shapes as far as possible. Avoid plots in shape of triangle, circle or oval and other irregular shapes.

4. Avoid buying land that is to the south-west, south, west and souh-east of your plot.

5. Avoid purchasing a smaller plot in between two bigger plots.

6.The plot should have slope towards north or east or north east to ensure all round prosperity and health.

7. Avoid proximity to religious places, factories, near burial grounds and cemeteries.

8. Sites with a growth towards north-east are auspicious.

9. North and east-facing plots are considered good for residential purposes.

10 West-facing plots are good for commercial purposes.

11 South-facing plots are considered good for commercial establishment dealing in food and entertainment business.

12 'Gurmukhi' plots are good for residential purposes.

13 'Sher-mukhi' plots are good for commercial purposes.

14 A temple in front, side or back of the plot is inauspicious especially if its shadow falls on the plot or building.

15 No high tension wire should pass above the plot.

16 'Vedha' like big tree, electronic poles or protruding corner of another house or building should not be directly opposite the site or house.

17 Plots which face a T-junction or Y-junction are considered inauspicious as these roads pont at the plot with lot of concentrated energy.

Acharya Ajay Mohan Lal

MAKAR SANKRANTI

Posted on January 10, 2013 at 10:10 AM Comments comments (508)

MAKAR SANKRANTI

Makar Sankranti is one of the most auspicious occasion for the Hindu and is celebrated in almost all the parts of the country in myriad cultural forms with great devotion, fervour and gaity. Makar Sankranti is perhaps the only Indian festival whose date always falls on the same date every year on the 14th January (with just a few exceptions when it is celebrated on 13th or 15th of January)

Makar means Capricorn and Sankranti is transition. There is a Sankranti every month when the sun passes from one sign of Zodiac to the another. There are twelve signs of Zodiac, so there are twelve sankranti. Each of these sankranti's has its own importance but there are two important sankrantis – namely- the Mesh (Aries) Sankranti and Makar (Capricorn) Sankranti. Transition of sun from sagitarius to Capricorn is known as Makar Sankranti. From this day, begins the six month long Uttarayana.

SIGNIFICANCE OF MAKAR SANKRANTI:-

The festival of Makar Sankranti is associated with cutural significance:-

1. The Puranas say that on this day sun visits the house of his son, 'Shani' who is the swami of Makar rashi. These father and son donot have cordial relationship but inspite of differences between them, Lord sun makes it a point to meet each other on this day. Father in fact, himself comes to his son's house for a month. This day symbolizes the healthy relationship of father and son. It is the son who has the responsibility to carry forward his father's dream and continuity of the family.

2. From Uttarayana starts the day of Devatas and Dakshinayana is said to be the night of 'devatas'. So the most auspicious things are done during this time.

3. It was on this day when Lord Vishnu ended the ever increasing terrorism of the Asuras by finishing them off and burying their heads under Mandar Parvat(mountains).So this occasion represents the end of negativities and beginning of an era of righteous living.

4. The great savior of his ancestors, Maharaj Bhagirath did the great 'Tapasya' to bring Gangaji down on the earth for the redemption of 60,000 sons of Maharaj Sagar who were burnt to ashes at the Kapil Muni Ashram, near Ganga Sagar. It was on this day that Bhagirath finally did tarpan with the Ganges water for his unfortunate ancestors and liberated them from the curse. After visiting the Patala for the redemption of the curse of Bhagirath's ancestors, Gangaji finally merged in the sagar.

5. Bhisma declared his intent to leave his mortal coil on this day. He had the boon of 'ICHHA-MITYU' from his father, so he kept lying on the bed of arrows till this day and left his mortal coil on Makar Sankranti. It is believed that the person who dies during the period of Uttaryana becomes free from transmigration.

HOW TO CELEBRATE:-

1. To get up early in the morning before sunrise, have bath and be ready with water & flower for the sun rise. Worship the rising sun by offering water,flower with both the hands & then pray with folded hands by chanting the Gayatri Mantra and pray for knowledge, wisdom and enlghtenment to rise in the similar way to greater & greater heights.

2. Do tarpan for your ancestors. Offer water to the ancestors while praying for their blessings. Resolve to redeem the pledge and pride of your forefather.

3. Prepare laddus or other sweets of Til & Gur and offer them to your friends & relatives.

4. Have a lunch of Khichiri. This will inculcate simplicity in your life and habits.,

5. Give some 'daan' on this day to someone who truly deserves.

6. Visit your son at his place and give presents to the son and the daughter -in-law. If it is not possible to visit, then organise to send presents to them to express your love & affection to them.

Acharya Ajay Mohan Lal

VASTU-VIDYA

Posted on January 6, 2013 at 8:45 AM Comments comments (16)

VASTU – VIDYA

Vastu Vidya is one of the most sacred vidya of ancient Indian knowledge. The word 'Vastu' means 'dwell' and vidya means science, so vastu vidya means science related to designing and building houses.

Vastu principles bring not only prosperity into home but also peace and love. Vastu Shastra is directed at harmonising external space with internal space within man. According to Vastu, the external and the internal are interchangeable because the underlying energies that govern the elements such as wind or fire, are the same as those that control the organs of the human body.Our ancient sages saw the influence of cosmic energies on living beings. They found that various energies that move around us in a particular pattern could be harnessed such that they resonated positively with the individual beings to make their lives meaningful and harmonious.

Vastu realigns the home with cosmic priciples such as solar energy, the movement of the celestial spheres, the magnetic field of the earth, gravity and the influence of the moon and sun. It offers a holistic approach to design houses. Although, the art of Vastu is ancient but it is relevant to-day as it was thousand years ago. It has universal application and is not confined to a particular climate or hemisphere.

Vastu Shastra advice should be solicited while selecting a plot or a house, building a house or carrying out renovations, additional construction, expansion, restructuring of the house, ship or office. Vastu correction can be helpful if you are facing problems like low sales, low profits, dispute, accidents in your office, factory nor shop or when you are facing problems like ill-health, marital problems, poor career growth and disturbances of the family peace in your home.

Many people live in rented homes and apartments and have absolutely no choice in making any structural changes. The vastu shastra can be helpful even to those people by making simple corrections and changes in the interior of the house leading to better energy flow and prosperity in house. The balancing of the primary elements of Nature within and around the house isdone by proper placement of furniture, water bodies, electrical and electronic gadgets, relocating doors with the help of mirror and wooden screens.

Vastu is for the betterment of mankind and brings love, peace and prosperity within a home. Vastu is much more relevant to-day than it was ever before. As man recedes from peace and happiness due to the modern, fast paced and stressful lifestyle, he is realising that the path to real happiness lies in the age old widom of ancient India.

If the various activities in a house, shop, office or industry are directionally channelised as per principle of vastu-shastra, we begin to draw power from Nature in a natural way. Once the immence force of the nature begins to support us, all our objectives are fulfilled in easy, spontaneously and effortless manner.

Acharya Ajay Mohan Lal

What is Saadhe Saati ?

Posted on December 30, 2012 at 3:45 AM Comments comments (0)

SAADHE SAATI

 It is seen among astrologer that Saturn's transit is considered bad except in 3,6 & 11 houses from Moon. The concept of Saadhe Saati is invariably taken as evil influence for all lagnas and rashis.

 

WHAT IS SAADHE SAATI?

When Saturn transit, 12th, 1st& 2nd house from one's natal Moon, it is called Saadhe Saati. As Saturn takes 2.1/2 years  in one's house, it takes 7.1/2 years in total in these 3houses. The effect of Saadhe Saati and Dhaiya on individual is good or bad depends on the placement of other planets in the birth chart. In my experience, I have  found that Shri H. N.Katwe, a very original astrologer of Maharastra had a theory, which gives more accurate results compared to the results of standard “ Saadhe Saati” based on entry of Saturn in transit into the sign before the natal Moon sign and its exit for the sign next to natal Moon. According to Shri H. N. Katwe (a Maharastrian Astrologer) to  calculate the Saadhe Saati, first note the natal Moon's degree, then substract 45 degreesfrom Moon's degree and then add 45 degrees to the natal Moon's degree, so thisOrb will be beginning and ending points of the Saadhe Saati in one's horoscope i.e. Saadhe Saati begins when Saturn is 45 degrees behind Moon and ends when it crosses 45 degrees beyond Moon.

 We should also judge the houses in which the Saadhe Saati is taking place. Planets and naksahatras which theSaadhe Saati influences should also be considered. Dending upon that good and bad results can be analysed.

Dhaiyyas is a period of 2.1/2 years which Saturn takes to transit through a sign. When Saturn transits through asign 4th from the the natal Moon, it is called “ Ardha – Ashtam”andwhen it transits through the sign 8th from the natal Moon, it iscalled “ Ashtam Shani”


OBSERVATIONS:-

  • Signification of Lordship of Moon, Saturn and houses (where the Saadhe Saati is taking place)activates during Saadhe Saati.
  • When the transitof other planets (preferably of major planets) are favourable along with dasha,“Saadhe Saati” cannot be adverse inspite of weak transit of saturn.
  • Ill effects ofSaadhe Saati are controlled if strong jupiter and Maha dasha lord in transitprotect the Moon by aspect or conjunction.
  • Ill effects arealso minimized if the Saturn is transiting over its exaltation sign, own signor friend's house.

 


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