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BHAIYA DOOJ

Posted on October 25, 2014 at 5:15 AM Comments comments (49)

                                                                                                                       भैया दौज

                    दीपावली पर्वो की कड़ी में भैया दूज पंच दिवसीय पर्व है| कातिक शुकल पक्ष की द्दितीया को यह पर्व मनाया जाता है, इसलिए इसे भैया दूज कहते है| इसका सम्बन्ध भाई -बहन के पवित्र प्रेम के आदान प्रदान से है| इस दिन भाई बहन के घर जाता है| कहते है कि जो भाई बहन के घर जाकर भोजन करता है उसकी अकाल मृत्यु नहीं होती इसलिए इसे यम द्दितीया भी कहते है| इसके पीछे हिंदू परम्परा में कथा है कि सूर्य कि संतानें यम और यमुना वर्षो बाद आज के दिन ही मिलें| यमुना ने यम का भर पूर स्वागत किया और प्रसन्न हो कर यम ने वरदान दिया कि आज के दिन जो बहन अपने भाई का सत्कार करेगी, तिलक लगायेगी, वह् सदा आनंद प्राप्त करेगी | इस दिन भगवान चित्र गुप्त की पूजा होती है क्यो कि चित्र गुप्त व्यकित के कर्मो का हिसाब रखते है| चित्र गुप्त का जन्म ब्र्रह्मा जी के चित्त से हुआ था | मुख्य रुप से इनकी पूजा भी भाई दूज के दिन होती है| इनकी पूजा करने से व्यकित को लेखनी, वाणी और विद्या का अदभुत वरदान मिलता है| सुबह नहा धोकर पूर्व दिशा की और मुख करके बैठ जाए ,चौक बनाये या लकडी की चौकी पर पीला कपड़ा बिछा ले उसपर चित्र गुप्त की मूर्ति या फोटो लगा ले| सामने देशी घी का दीपक जलाये| सफेद कागज पर हल्दी मिलें पानी में उंगली डुबोकर पहेले ॐ गणेशाय नम लिखे फिर 11 बार ॐ चित्र गुप्ताय नम: लिखकर उसे चित्र गुप्त भगवान को अर्पित कर दे, जिस कलम से लिखा है उसे अपने पास सुरक्षित रख ले भले refill बदल सकते है| पर कलम वही अपने पास रखे|इस दिन यमराज की भी पूजा करतें है | शाम को घर के मुख्य दरवाजे के पास बायी तरफ़ मिट्टी के कलश में पानी भरकर रखे|फिर उस पर सरसों के तेल का चौमुखी दीपक रख कर जलाये| सुबह को उस जाल से पूरे घर में छिड़काव करे| इससे स्वास्थ्य उत्तम रहेगा और बीमारी से मुकित मिलेगी|

                  मनचाहे जीवन साथी पाने के लिए इस दिन अगर शिव- गोरी की उपासना की जाय तो वह् शीघ्र लाभकारी होती है| इस दिन शिव गोरी के साथ कैलाश पर्वत पर विराजमान रहते है| इनकी संयुक्त रुप से पूजा करे तथा सफेद व लाल फूलों की एक माला दोनों को एक साथ पहनाये और शीघ्र विवाह के लिए प्रार्थना करे|

                 जैन परंपरा के अनुसार महावीर निर्वाण के बाद उनके बडे भाई राजा नंदिवर्धन दाह संस्कार के बाद भी वहां बैठै विलाप कर रहे थे| परिजनों से उनका यह हाल देखा न गया | अंत: उनकी बहन सुर्दशाना ने आकर उन्हें शौक मुक्त किया }

 

आचार्य अजय मोहन लाल

NAAG PANCHAMI PAR POOJA

Posted on July 31, 2014 at 5:05 PM Comments comments (13)

नाग पंचमी पर पूजा

नाग पंचमी श्रवण मास में शुक्ल पक्ष की पंचमी को मनाया जयेगा| यह श्रद्धा विश्वास का पर्व है| नगों को धारण करने वाले भगवान भोलेनाथ की पूजा आराधना करना भी इस दिन विशेष रुप से शुभ माना जाता है|

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार पंचमी तिथि के स्वामी नाग देवता है| श्रवण मास में नाग पंचमी होने के कारण इस मास में धरती खोदने का कार्य नहीं किया जाता| भूमि में हाल चलाना, नीव खोदना शुभ नहीं माना जाता है| भूमि में नाग देवता का घर होता है, भूमि खोदने से नगों को कष्ट होने की सम्भावना होती है तथा नाग अपने बिलों से बाहर आकर काट भी सकते है|

नाग देवता कि पूजा उपासना के दिन नगों को दूध पिलाने का कार्य नहीं करना चाहिए| शिव लिंग को दूध से स्नान करा सकते है|दूध पिलाने से नगों की मृत्यु का कारण हो सकती है| ऎसे में नगों को दूध पिलाना, अपने हाथों से अपने देवता की जान लेने के बराबर होता है| इसलिए भूलकर ऐसी गलती करने से बचना चाहिए| नगों की स्वंतत्र पूजा नहीं करनी चाहिये| सिर्फ़ नगों की पूजा करने का मतलब है कि NAGATIVE की पूजा करना है| शिव के गले में नाग शुभ है तथा शिव के साथ ही पूजा करनी चाहिए|

सुबेरे उठ कर शिवाजी का स्मरण करे| उनका अभिषेक करे, उनको जल तथा बेलपत्र चदाये | नगों को हलदी, रौली, चावल और फूल चदाये | इसके बाद चने, खील बदाशे और कच्चा दूध अर्पित करे| घर के मुख्य द्वार पर दोनों और गोबर या गेरु या मिठ्ठी से सर्प की आकृति बनाए तथा मंत्र " ओम कुरु कुल्ले फट" कहते हुए जल को पूरे घर में छिडाक दे|

अगर आप को सपने में साँप आते है या सर्प से भय लगता हो तो नगों कि विशेष पूजा तथा प्रार्थना करनी चाहिए| अगर आप राहु या केतु से परेशान हो रहे है तो आप नाग पंचमी पर उपाय कर सकते है| इस दिन आप एक बड़ी तथा मोठी रस्सी ले आए तथा उसमे सात गाठे लगा ले तथा इसको यह मानिये कि यह सात गाठे वाला एक सर्प है| इसको एक आसन पर रख दे |

आप इसको कच्चा दूध, बताशे, फूल अर्पित करे| गुग्गल कि धूप जलाये | इसके बाद राहु का मंत्र का जाप करे| राहु का मंत्र " ओम राँ रहुवे नम:" का जाप करे| इसके बाद केतु का मंत्र " ओम केँ केतुवे नम:" का पाठ करे | ,मंत्र पढ़ने के बाद रस्सी के सातों गाँठों को खोल दे तथा रस्सी को बहते हुए जल में बहा दे | आप कि राहु या केतु से जितनी भी समस्याये है सब की सब शान्ति हो जायेगी |

2.आप चाँदी का नाग तथा नागिन लेआये तथा एक स्वस्तिक ले आए| नाग और नागिन को एक थाल में तथा स्वस्तिक को एक थाल में रखे तथा पूजा करे| नाग नागिन को कच्चा दूध तथा स्वस्तिक पर बेलपत्र अर्पित करे| "ओम नागेंद्र्हाराय नम:" का जाप करते रहे|नाग नागिन को शिवलिंग पर अर्पित कर दे तथा स्वस्तिक को लाल धागे में डाल कर पहन ले|

3. शिव के मंदिर जाएँ जिसके शिवलिंग के ऊपर सर्प का छत लगी हो | शिवलिंग पर पंचामृत ऐसे अर्पित करे कि वो सर्प पर से होता हुआ शिवलिंग पर आए फिर गंगा जल चढाये | " ओम नमो नील कंठाय " का जाप करते रहे|

इन सभी उपाय से दुष्ट योगों का प्रभाव कम हो जाता है |

आचार्य अजय मोहन लाल

 

 

 

 

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Posted on August 2, 2013 at 5:55 AM Comments comments (1)

शयन में देव धार्मिक एवं मांगलिक कार्य क्यों नहीं ?

ब्रह्मा जी ने प्रकृति की स्थापना एवं आवश्यक जीवन के लिए छ्ह ऋतुओ की स्थापना की जिन्हें ग्रीष्म, वर्षा, शीत,हेमंत,शिशिर,बसंत आदि नामों से पुकारा गया| इसी आधार को लेकर छ्ह माह देव शयन और छह माह देव जागरन को रखा गया,जिसे ज्योतिष विज्ञान उत्तरायण एवं दक्षिणायन कहता है |उत्तरायन में देवताओं का जागरण होता हे|इस समय जो भी कार्य किया जाते हे वह् देवताओं को प्राप्त होते है और कार्य पूर्ण शुभ भी रहते है|दक्षिणायन में राक्षसों का अधिकार होता हे| इस समय जो भी कार्य किया जाते है, उनमे कोई ना कोई बँधा अवश्य आती है और कार्य भी परिपूर्ण नहीं होते, इस समय दी गई आहूति भी राक्षसों को प्राप्त होती हे|

शास्त्रों के आधार पर हमारे मुख्य तीन देवता हे- ब्रह्मा,विष्णु एवं महेश | एक उत्पत्ति करते है, दूसरे पालन और तीसरे उसका अंत और इन तीनों के भी शयन का समय भारतीय शास्त्रों में निर्धारित है| प्रत्येक शयन के लिए चार- चार माह दिए गए हे |सबसे पहले ब्रह्मा जी का शयन होता हे जो पौष मास में प्रारंभ होता है इस समय विष्णु और शिव जागकर पृथ्वी का पालन और रक्षा का दायित्व निभाते है| इसके बाद आषाढ शुक्ल एकादशी अर्थात देव शयन एकादशी से देव उठान एकादशी तक विष्णु का शयन होता है, इसलिए सारे धार्मिक और मागलिक कार्य अस्त रहते है,क्योंकि भगवान विष्णु पृथ्वी के पालनहार और भोक्ता हे| इसलिए उनके शयन के समय कोई रचना नहीं की जां सकती | इस समय शिव जागरण होता है और शिव जागते रहते है|इसलिए मंदिरो में इस समय शिव पूजा का अधिक विधान रहता है| श्रावन मास में शंकर को मानकर अधिक पूजा जाता है|इसके बाद शिव शयन होता है जो भाद्रपद मास की अमावस्या से शिवरात्रि तक चलता है, जिसमे मदिरौ में शिव जी के ऊपर टपकने वाला बर्तन (जलहरी) हटा दिया जाता है| शिवरात्रि के दिन पुन: शिवलिंग के ऊपर जाल वाला बर्तन लगा दिया जाता है| इस प्रकार यह क्रम चलता रहता हे| इसका अर्थ यह हे कि विष्णु शयन के कार्यकाल में धार्मिक और मांगलिक कार्य नही होनी चाहिए क्यूँकि न विष्णु पृथ्वी पर होते है ना ही उत्तरायण एवं ना ही उत्तरगोल| जब सब चीजीं का लोप हो जाता हे तो फिर हमारे भविष्य निर्माण के महत्वपूर्ण पलों को क्यों हम देवशयन में करे|

आचार्य अजय मोहन लाल